आज भी जिंदा है 'लाह' की परम्परा, प्रेम और आपसी सहयोग की अनुठी मिशाल - Sangri Times

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आज भी जिंदा है 'लाह' की परम्परा, प्रेम और आपसी सहयोग की अनुठी मिशाल

ये दृश्य केवल गांवो में ही मिलते है।

 

धोरीमन्ना. मीठङा खुर्द (धोरीमन्ना) यह दृश्य साऊओ की बेरी सरहद स्थित मीठङा खुर्द पुर्व सरपंच व पूर्व अखिल भारतीय किसान संघ जिला सचिव अचलाराम जाणी के  खेत में खरपतवार निकालते किसान। स्थानीय भाषा में इसे 'लाह' कहते हैं और इसमें  शामिल लोगों को  लाहिया कहा जाता है। स्थानीय निवासी भंवरलाल विश्नोई ने बताया कि आज भी किसानों में लाह की परंपरा जिंदा है जिसमें किसान एकजुट होकर एक दूसरे की फसल काटने में मदद करते हैं जिससे यह काम आसान हो जाता है।
परस्पर सहयोग से आसान हुआ काम सभी ग्रामवासी मिलजुलकर एक परिवार की भांति रह रहे हैं। गांव के लोग एकता, अनुशासन और संयम का परिचय दे रहे हैं। गांव में मौजूद संसाधनों से ही लोग काम चला रहे हैं। परस्पर सहयोग से मुश्किल काम भी आसान हो गया है।
सभी प्रेम भाव से रहते हुए एक दूसरे का उनका कृषि अन्य कार्य में सहयोग भी कर रहे हैं। अच्छा लग रहा है। किसान जब किसी भी फसल की खेती करते हैं तो पौधों के सही विकास और उनके पोषण के लिए खेत में उर्वरक और सिंचाई का पूरा ध्यान रखते हैं. सही मात्रा में पानी और खाद पौधों के लिए बहुत ज़रूरी है जिससे किसानों को सही समय पर अच्छा उत्पादन मिल सके. अगर इस तरह के पोषण तत्व, जो कि केवल पौधों के लिए ही हैं, खरपतवार के साथ बंट जाएँ तो पौधों के सही विकास के लिए यह उचित नहीं है. ऐसे में खेतों की फसल के साथ उगे हुए अनचाहे खरपतवार का नियंत्रण करना बहुत ज़रूरी है।

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