भगवान भरोसे सैंकड़ो भिक्षुक बिना मास्क के घूम रहे जैसाण में

वक्त के साथ भिक्षुकों का गढ़ बन रही जैसाणनगरी

जैसलमेर।1991 में आई संजय दत्त की फ़िल्म 'सड़क' का गीत रहने को घर नहीं,सोने को बिस्तर नहीं...इनका खुदा ही रखवाला कहीं न कहीं जैसलमेर में घुम रहे सैकड़ो भिक्षुकों पर खरा उतरता है। 


भिक्षुक जो न तो मास्क पहनते है,न ही सेनेटाइजर का उपयोग करते है। कोरोना को लेकर दुनिया भर में रिसर्च चल रही है,परन्तु अब तक कोई निष्कर्ष निकल कर सामने नही आया है।मास्क,सेनेटाइजर व डिस्टेंस के साथ अन्य सावधानियां बरतना ही इसका उपाय बताया जा रहा है।कोरोना के प्रति जन जागरूकता अभियान के नाम पर करोड़ो रूपये खर्च किए जा रहे है।


जहां इन दिनों कोरोना को लेकर के सोशल डिस्टेंसिंग, नो मास्क- नो एंट्री के  साथ ही कोरोना जागरूकता की बात कही जा रही है। वहीं कोरोना के वाहक बन चुके भिक्षुकों पर किसी का ध्यान नही गया है। शहर के गड़ीसर चौराहा, एयरफोर्स चौराहा व हनुमान चौराहा के साथ-साथ कई मुख्य स्थानों पर यह भिक्षु रात में अपना डेरा डालते है। शहर के आला अधिकारियों का इन मुख्य चौराहो से आना जाना लगा रहता है। वही कोरोना जागरूकता को लेकर के संचालित सामाजिक संस्थाओं द्वारा भी इन किस्मत के मारे भिक्षुकों की कोई देखरेख नहीं हो रही है। जिसके चलते यह भिखारी भिक्षा को घूम रहे है और कोरोना को बढ़ावा दे रहे है। ये प्रतिदिन 150-200 लोगों के सम्पर्क में आ रहे है। दो जुन की रोटी के चलते कोरोना गाइड लाइन इनके लिए कोई महत्व  नहीं रख रही है। वही जिला चिकित्सा विभाग द्वारा भी इनकी जाँच नही हो रही है,जिससे कोरोना का खतरा बढ़ता नजर आ रहा है।


पेट की आग ने मिटाया कोरोना का डर

 इनकी इस पेट की आग से कोरोना के संक्रमण का खतरा ओर भी बढ़ता जा रहा है क्योंकि ये लोग प्रतिदिन सैकड़ो लोगों के सम्पर्क में आ रहे है वही  न तो इनके पास  मास्क है और न ही साबुन। ये शहर में मुख्य चौराहों पर घूम रहे है और लोगों के सम्पर्क में आ रहे है।

वही जिन स्थानों,पार्को, फुटपातो पर सामान्य जनता का आना-जाना होता है रात्रि में वही  स्थान इन भिक्षुओं का विश्राम गृह बन जाता है।


रब के साथ सबने ने फेरी निगाहें

शहर के मुख्य चौराहे जो इन भिक्षुकों के आशियाने बने हुए है इन मुख्य मार्गो से शहर के कई जनप्रतिनिधियों,आलाअधिकारियों,सामाजिक कार्यकर्ताओं का आना-जाना होता है लेकिन इन भिक्षुओं की तरफ किसी का भी ध्यान नहीं जा रहा है। यदि इन भिक्षुकों के भोजन व रहन-सहन की व्यवस्था जिला प्रशासन व सामाजिक संस्थाओं द्वारा की जाए तो कोरोना रोकथाम में ये सराहनीय कदम हो सकता है।


अब इनकी भी सुध लो सरकार

कोरोना के चलते हम सम्भावनाओं को नही ठुकरा सकते है। यह वाहन हो सकते है इसलिए अब प्रशासन व सरकार को चाहिए कि वह एक नीति बनाकर इन भिक्षुकों के लिए कुछ करे। इनका पुनर्वास करवाने के प्रयास करे ताकि यह मन्दबुद्धि भिक्षुकों को जीवन की मुख्यधारा में लौट सके।


सांगरी टाइम्स हिंदी न्यूज़ के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन और टेलीग्राम पर जुड़ें .
लेटेस्ट वीडियो के लिए हमारे YOUTUBEचैनल को विजिट करें