हज़रत पीर कुर्बान शाह बापू की दरगाह साम्प्रदायिक सौंदर्य की प्रतीक एवं कौमी एकता की जीवंत मिसाल है

भारत मे सुफिज्म की शुरुआत ख्वाजा गरीब नवाज के दौरे से हुई । हज़रत पीर कुर्बान अली शाह बाबा भी सूफ़ी सन्त थे। बापू का सम्बंध ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती के चिश्तिया ने धराने से है। बापू की की दरगाह जन आस्था का प्रतीक है ये दरगाह सदियों पुरानी है। हजरत कुर्बान अली शाह बापू को मारवाड़ के धनी के नाम से प्रसिद्ध है। बापू सउदी अरब के रहने वाले थे विश्व भृमण के दौरान भारत के इसी कोने में बस गये थे। यहां दिन दुखियों की सेवा की तथा कौमी एकता का परचम लहराया । बापू को पशुओ के प्रति गहरा लगाव था। बापू ने अपने हाथों से रातेलानाड़ी की खुदाई करवायी थी जो आज भी मौजूद है। राहगीरों ओर पशु यहां आकर अपनी प्यास बुझाते थे। जिंदा वली के रुप में लोगो की मद्दत की ऐसी किवदंती है कि इस वीरान जंगल मे जब लोग रास्ता भटक जाया करते थे। तब हजरत पीर कुर्बान अली शाह बापू घोड़े पर सवार होकर उसे अपने घर तक छोड़ने जाया करते थे । बापू को गायो के प्रति बहुत लगाव था , चमत्कार भी दिखाया हाजी कुर्बान शाह बापू को गायो से बहुत ज्यादा लगाव था। ग्रामीण बताते हैं कि एक बार जंगल मे प्यासी गायो को चरवाहे ने रातेलानाड़ी में पानी पीने से रोक दिया था तब चरवाहे के ऊपर बापू ने नाराज होकर उसे चमत्कार बताया था। बापू के मज़ार पर सभी धर्म जाती के लोग आते है ।

वास्ता इस्लाम धर्म से था जबकि सेवक दूसरे धर्मों से थे । 1396 ई. में दुनिया से पर्दा फरमाया हजरत पीर कुर्बान शाह बापू हिजरी सन 817 यानी 1396 ई. में दुनिया को अलविदा का बापू का आलीशान मजार है। दुनिया से पर्दा फरमा जाने के बाद भी यहाँ जायरीनों की भीड़ उमड़ती है। यह सिलसिला आज तक अनवदत जारी है। जुम्मेरात को यहां पर जायरीनों का सैलाब उमड़ता है। यहाँ विभिन्न धर्म जाती के लोग मुक़्क़दम बारगाह में हाजरी देकर चौखट चूमते है। लोग दुरो-दराज से यहाँ जियारत करने आते है। रोगियों , दुःखीयी तथा असहाथो की भीड़ सदा यहां लगी रहती है। उनकी हर जायज तमन्ना पूरी होती है। बेऔलादो को औलाद गम्भीर बीमारियों से शिफा सहित अनेक कस्टो का निवारण होता है। यहां एक 70 साल की औरत के जुड़वा संतान प्राप्ति का मन्नत का किस्सा लोगो मे काफी लोकप्रिय है। पशु - पक्षियो से बहुत प्रेम था हजरत पीर कुर्बान शाह बापू को पशु- पक्षियों से बहुत लगाव था । दरगाह परिसर में पालनधर के रूप बड़े पिजरे बने हुए है। यहाँ विशेष प्रजाति के सफेद कबूतरों का झुण्ड है। खरगोश , बतख तथा रंग - बिरंगे तोते जायरीनों का ध्यान आकर्षित करते है। मौलाना निसार अहमद इन पशु - पक्षियो के लिए खाने - पीने , चिकित्सा तथा अन्य वातावरणीय प्रबंधन करते है। खादिम भवन के सामने बगीचा बना हुआ है जिसे दिलखुश गार्डन कहते है। इसमें पेड़ - पौधे व उन पर लगे रंग - बिरंगे फूल तथा बगीचे में चादर की तरह फैली हुई दुब आंगतुकों का मनमोहित करती है। दरगाह में कार्यरत सेवक बगीचे की देखभाल करते है। कैसे पहुँचा जाये दरगाह तक हजरत पीर कुर्बान अली शाह बापू रातेलापीर की दरगाह राजस्थान राज्य के जालोर जिले के भीनमाल तहसील के ग्राम कोटकास्ता स्थित है । यह दरग़ाह जिला मुख्यालय जालोर से 65 किलोमीटर तथा भीनमाल से उत्तर-पूर्व 17 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। राजस्थान राज्य मार्ग 31 पर स्थित गाव घासेड़ी से मात्र 5 किलोमीटर की दूरी उतर - पूर्व दिशा मे है। जबकि ग्राम कोटकास्टा से पूर्व की ओर मात्र 2 किलोमीटर की दूरी पर तवाव गांव के रास्ते पर स्थित है। दरगाह तक पहुंचने के लिए सड़क मार्ग की सेवा उपलब्ध है। हजरत पीर कुर्बान अली शाह बापू की दरगाह 620 वर्ष पुरानी है। बाबा का उर्स हजरत पीर कुर्बान अली शाह बापू का उर्स ख्वाजा गरीब नवाज दरगाह अजमेर की तरह इस्लामी माह रज्जब में आयोजित होता है। उर्स दो दिवसीय होता है। रज्जब माह की पहली तारीख को बाबा के उर्स का झण्डा चढ़ाया जाता है। उर्स में चादर व गिलाफ पोशी की रस्म अदा होती है । पहले दिन मिलाद शरीफ का आयोजन होता है। जिसमे देश के नामी - गिरामी मुक़रीरे खुशुशी व नातख़्वाह तशरीफ लाते है । दूसरे दिन कौमी एकता समारोह आयोजित होता है। जिसमे साम्प्रदायिक सौहार्द रंग झलकता है।

उर्स का खास आकर्षित कव्वाली का मुकाबला होता है। जो देश के प्रसिद्ध कव्वाल अल सुबह तक कव्वाली प्रस्तुत करते है। उर्स का समापन आखिरी कुल की रस्म से होता है। दरगाह के पास में ही खादिम की कब्रह है हजरत पीर कुर्बान शाह बापू की दरगाह के पहले खादिम मोहम्मद ताज मोहम्मद का इंतकाल 21 अगस्त 2019 को हुआ था। दरगाह के पास ही मोहम्मद ताज मोहम्मद की कब्रह बनाई हुई वहाँ जायरीन दुआ करते है। करीब 40 -50 वर्ष तक कि दरगाह की सेवा की वह जायरीनों की सेवा की अभी दरगाह की देख रेख मौलाना निसार अहमद कर रहे है। इनका कहना है हम दरगाह परिषद में जाकर दरगाह का जायजा लिया एव दरगाह पर रिसर्च किया एव दरगाह खादिम मौलाना निसार अहमद से बता की -युनुस खान संवादता भीनमाल ये दरगाह करीबन 620 वर्ष पुरानी है दरगाह में जायरीन जो भी दुआ मुरादे मांगते है वो मुरादे पूरी होती दरगाह के पास में रातेलापीर नाड़ी है को कुर्बान शाह बापू के हाथों से खुदाई की गई है एवं दरगाह परिषद में खेजड़ी का व्रक्ष है जो खुद बापू के हाथों बोया हुआ है । - मौलाना निसार अहमद खादिम : दरगाह रातेला पीर यहाँ विभिन्न धर्म जाती के लोग मुक़्क़दम बारगाह में हाजरी देकर चौखट चूमते है। लोग दुरो-दराज से यहाँ जियारत करने आते है। रोगियों , दुःखीयी तथा असहाथो की भीड़ सदा यहां लगी रहती है। उनकी हर जायज तमन्ना पूरी होती है। यहां एक 70 साल की औरत के जुड़वा संतान प्राप्ति का मन्नत का किस्सा लोगो मे काफी लोकप्रिय है। - निसार चौहान तवाव उपाध्यक्ष : भाजपा ग्रामीण मण्डल भीनमाल बापू को पशु- पक्षियों से बहुत लगाव था । दरगाह परिसर में पालनधर के रूप बड़े पिजरे बने हुए है। यहाँ विशेष प्रजाति के सफेद कबूतरों का झुण्ड है। खरगोश , बतख तथा रंग - बिरंगे तोते जायरीनों का ध्यान आकर्षित करते है। - सद्दाम हुसैन ग्रामीण तवाव बापू की दरगाह जन आस्था का प्रतीक है ये दरगाह सदियों पुरानी है। हजरत कुर्बान अली शाह बापू को मारवाड़ के धनी के नाम से प्रसिद्ध है। बापू सउदी अरब के रहने वाले थे विश्व भृमण के दौरान भारत के इसी कोने में बस गये थे।


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