कविता: रेल की खिड़की से बाहर - Sangri Times

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कविता: रेल की खिड़की से बाहर

रेल की खिड़की से बाहर,
देखा मैंने के एक बुज़ुर्ग अपने घर का कमाऊ सदस्य है,
मैंने देखा कि, नाज़ुक काँधों पर बस्ते की जगह बोतलों की बाल्टी है!
और एक परिवार, कड़ी धूप में कच्चे घर में बसर करता है,
घर की छत में एक छेद है शायद,
जिससे एक नवजात की नींद में खलल पड़ता है..!
बड़ी बड़ी इमारतों के बीच, ये कच्चे घर नज़र अंदाज़ हो जाते हैं,
यहाँ बुज़ुर्गों की उम्र ढलती नहीं और बच्चे वक़्त से पहले बड़े हो जाते हैं!
©लक्की सिंह

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