Poetry: कलम तूलिका का हो आलिंगन

कलम तूलिका का हो आलिंगन,

तो अभिव्यक्ति का राग वहीं।

है फूल जंहा तो खार वहीं,

जंहा शमां है, आग वहीं।

बंद पलको के पीछे कल्पित नींदों में खो जाती हूं,

जंहा नींद के झौंके हैं,

सपनों का अनुराग वहीं।

कलम तूलिका का हो आलिंगन,

तो अभिव्यक्ति का राग वहीं।

किसी कली का आलिंगन कर जब अली उड़ जाता है,

अली तो मकरंद चूसा करता है

फूल मगर मुस्काता है।

पतंगा लेता अग्नि के फेरे और बलि चढ़ जाता है,

जंहा प्रीत की अग्नि जलती है,

परवानों का भाग वहीं।

कलम तूलिका का हो आलिंगन, तो अभिव्यक्ति का राग वहीं।

इंसान का गिरता देख स्तर,

इंसानियत डरती रहती।

है रंग विहीन तूलिका,

फिर भी संभव रंग भरती रहती,

एक तुच्छ प्रयास करती रहती।

जंहा प्रयास सफल हुआ,

प्रगति का मार्ग वहीं।

कलम तूलिका का हो आलिंगन ,

तो अभिव्यक्ति का राग वहीं।



योगिता शर्मा 

जयपुर


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