Poetry: अपने काँटों से लगे और पराये फूल

हाथ मिलाते गैर से, अपनों से बेजार।

सौरभ रिश्ते हो गए, गिरगिट से मक्कार।।
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अपनों से जिनकी नहीं, बनती सौरभ बात !
ढूंढ रहे वो आजकल, गैरों में औकात !!
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उनका क्या विश्वास अब, उनसे क्या हो बात !
सौरभ अपने खून से, कर बैठे जो घात !!
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चूहा हल्दी गाँठ पर, फुदक रहा दिन-रात !
आहट है ये मौत की, या कोई सौगात !!
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टूट रहे परिवार हैं, बदल रहे मनभाव !
प्रेम जताते ग़ैर से, अपनों से अलगाव !!
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गलती है ये खून की, या संस्कारी भूल !
अपने काँटों से लगे, और पराये फूल !!
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ये भी कैसा प्यार है, ये कैसी है रीत !
खाये उस थाली करे, छेद आज के मीत !!
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चारों ओर गिरे हुए, रिश्ते लाज चरित्र !
अपने बेगाने हुए, दुश्मन के घर मित्र !!
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सीखा मैंने देर से, सहकर लाखों चोट !
लोग कौन से हैं खरे,और कहाँ है खोट !!
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राय गैर की ले रखे, जो अपनों से बैर !
अपने हाथों काटते, वो खुद अपने पैर !!
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ये भी कैसा दौर है, सौरभ कैसे तौर !
अपनों से धोखा करें, गले लगाते और !!
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अपनों की जड़ खोदते, होता नहीं मलाल !
हाथ मिलाकर गैर से, करते लोग कमाल !!
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अपने अब अपने कहाँ, बन बैठे गद्दार।
मौका ढूंढें कर रहे, छुप-छुपकर वो वार।।
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आज नहीं तो कल बनें, उनकी राह दुश्वार।
जो रिश्तों का खून कर, करें गैर से प्यार।।
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---प्रियंका सौरभ 
रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,
कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

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