खाद्य परिरक्षकों ,औषधियों और बहुलकों के निर्माण के लिए नई विधि कुशलतापूर्वक फिनोल को एक प्रमुख घटक में बदल सकती है


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भारतीय शोधकर्ताओं ने पाया है कि सतह-संशोधित इलेक्ट्रोड का उपयोग करके विद्युत अपघटन (इलेक्ट्रोलिसिस) के माध्यम से  प्रयुक्त  फिनोल को 1,4 - हाइड्रोक्विनोन में कुशलता से  बड़े पैमाने पर परिवर्तित करने  के बाद  उसका उपयोग खाद्य परिरक्षकों (फूड प्रिजर्वेटिव्स),  औषधियों (फार्मास्यूटिकल्स), रंजक (डाइज)  एवं,  बहुलकों (पॉलिमर) के निर्माण के लिए किया जा सकता है। भारत वर्तमान में फिनोल को 1,4 - हाइड्रोक्विनोन में बदलने के लिए कुशल प्रक्रियाओं के अभाव  के चलते  भारी लागत पर 1,4 - हाइड्रोक्विनोन का आयात करता है।

फिनोल और इसके ऑक्सीकृत उत्पाद जैसे 1,4 – हाइड्रोक्विनोन, कैटेचोल, या रिसोरसिनॉल ऐसे महत्वपूर्ण और प्राथमिक निर्माण घटक (बिल्डिंग ब्लॉक)  हैं जिनका उपयोग कई औषधीय और औद्योगिक रूप से उपयोग किए जाने वाले कार्बनिक यौगिकों के संश्लेषण में किया जाता है। विशेष रूप से 1,4 हाइड्रोक्विनोन जैसे उत्पादों का उपयोग खाद्य परिरक्षकों (प्रिजर्वेटिव्स),  औषधियों (फार्मास्यूटिकल्स), रंजक (डाई),  बहुलक (पॉलिमर) आदि के निर्माण में मध्यवर्ती के रूप में किया जाता है। इसके अतिरिक्त फिनोल के ऑक्सीकरण से भारी मूल्यवर्धन होता है। भारत 2 करोड़ 36 लाख  अमरीकी डालर मूल्य के फिनोल का आयात करता है साथ ही 1,4 - हाइड्रोक्विनोन आयात करने के लिए भारत  5 करोड़ 65 लाख अमेरिकी डॉलर  खर्च करता है। परंपरागत रूप से  फिनोल का ऑक्सीकरण रासायनिक तरीकों से किया जाता है जिसमें खतरनाक ऑक्सीकारकों (ऑक्सीडेंट) के साथ  उत्प्रेरक के रूप में  कीमती धातुओं, धातु ऑक्साइड और एंजाइमों के साथ खतरनाक ऑक्सीडेंट के साथ उत्प्रेरक का उपयोग किया जाता है। लेकिन इन विधियों में कई नुकसान  भी हैं, जिनमें प्रारंभिक सामग्री का अधूरा रूपांतरण और पर्यावरणीय खतरों के साथ-साथ उत्पाद की चयनात्मकता की कमी शामिल है।

इस पृष्ठभूमि में, डॉ. भगवतुला प्रसाद के नेतृत्व में नैनो एवं मृदु पदार्थ विज्ञान केंद्र (सेंटर फॉर नैनो एंड सॉफ्ट मैटर साइंसेज) के शोधकर्ताओं एवं विज्ञानी और औद्योगिक अनुसंधान परिषद – राष्ट्रीय रसायन प्रयोगशाला (सीएसआईआर-नेशनल केमिकल लेबोरेटरी) ने विद्युत अपघटन (इलेक्ट्रोलिसिस) द्वारा  फिनोल के ऑक्सीडेटिव परिवर्तन को 1,4 हाइड्रोक्विनोन में रूपांतरित किएजाने  का एक प्रभावी तरीका माना है । यह शोध कार्य  हाल ही में 'न्यू जर्नल ऑफ केमिस्ट्री' में प्रकाशित हुआ है।

आर्थिक और पर्यावरणीय लाभों की पेशकश के कारण पारंपरिक रासायनिक परिवर्तन विधियों के स्थान पर विद्युत रासायनिक (इलेक्ट्रोकेमिकल) कार्बनिक परिवर्तनों  के उपयोग इन दिनों बहुत रुचि ली  जा रही  है। चूंकि ऐसे  रूपांतरणों को आम तौर पर सब्सट्रेट (इस मामले में फिनोल) के माध्यम से बिजली पारित करके जलीय माध्यम में किया जाता है और  इस प्रक्रिया में कोई पर्यावरणीय रूप से खतरनाक आक्सीकारक (ऑक्सीडेंट)/ अपचायक  (रिडक्टेंट)  शामिल नहीं होते हैं। यद्यपि विद्युत रासायनिक परिवर्तन इतने सारे लाभ प्रदान करते हैं,  तथापि विशेष रूप से फिनोल ऑक्सीकरण के संबंध में कई व्यावहारिक मुद्दे भी आ जाते हैं।

उदाहरण के लिए, इस परिवर्तन के लिए पारंपरिक धातु-आधारित इलेक्ट्रोड का उपयोग नहीं किया जा सकता है क्योंकि वे समय बीतने के साथ अपनी सतहों पर ऑक्सीकृत उत्पादों को सोख लेने  के कारण अपनी सक्रियता को खोना शुरू कर देते हैं। इसके अलावा, कई बार इनसे  फिनोल का अति ऑक्सीकरण भी  होने लगता हैं जिसके परिणामस्वरूप उत्पाद की चयनात्मकता में कमी आना और अवांछित उत्पाद निर्माण (टार) शुरू हो जाता है। इसके अतिरिक्त, कुछ इलेक्ट्रोड समय बीतने के साथ ही अपनी भौतिक स्थिरता और स्थायित्व जैसे मुद्दों से भी ग्रस्त हैं।

विस्तृत चक्रीय वोल्टमैट्रिक अध्ययनों के माध्यम से  राष्ट्रीय  रासायनिक प्रयोगशाला (एनसीएल)  और नैनो एवं मृदु पदार्थ विज्ञान केंद्र (सेंटर फॉर नैनो एंड सॉफ्ट मैटर साइंसेज सीईएनएस) के शोधकर्ताओं ने स्थापित किया है कि इन सभी कठिनाइयों को हाइड्रॉक्सिल (-सी-ओएच), कार्बोक्सिल (-सीओओएच), और कार्बोनिल (सी=ओ) समूह जैसे ऑक्सीजन-प्रभाव सतह वाले कार्यात्मक समूहों की वांछित संख्या के साथ अव्यवस्थित ग्राफीन जैसी संरचनाओं वाले इलेक्ट्रोड का उपयोग करके दूर किया जा सकता है। किसी भी  अम्लीय वातावरण में इलेक्ट्रोड के विद्युत रासायनिक उपचार द्वारा सतह संशोधन फिर से प्राप्त किया जा सकता है। रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी और एक्स-रे फोटोइलेक्ट्रॉन स्पेक्ट्रोस्कोपी जैसी प्रविधियों  का उपयोग करके व्यवस्थित अध्ययनों के आधार पर  शोधकर्ताओं ने इस सतह संशोधन के लिए इष्टतम परिस्थितियों का निर्माण  किया। इस तरह के उचित सतह-संशोधित कार्बोनेसियस इलेक्ट्रोड के साथ 1,4 - हाइड्रोक्विनोन की 87% चयनात्मकता फिनोल का उत्कृष्ट रूपांतरण 99%  था।

शोधकर्ता वर्तमान में अन्य औद्योगिक रूप से ऐसी प्रासंगिक प्रक्रियाओं  पर ध्यान दे रहे हैं जिन्हें ऐसे पर्यावरणीय रूप में सौम्य विद्युत –कार्बनिक (इलेक्ट्रो-ऑर्गेनिक) परिवर्तनों द्वारा पूरा किया जा सकता है।



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