बहादुर रोशनी बैरवा बाल विवाह के खिलाफ लड़ कर बनी चेंजमेकर

वह राजस्थान में कम उम्र में मातृत्व को समाप्त करने के लिए पापुलेशन फाउंडेशन ऑफ़ इंडिया द्वारा चलाए गए #ZeroTeenMothers अभियान में शामिल हुई.
राजस्थान की रोशनी बैरवा केवल दो साल की थीं जब उसने अपने पिता को खो दिया था. उसकी माँ ने उसे जल्द ही छोड़ दिया. उसकी परवरिश दादा-दादी और रिश्तेदारों ने की थी. कुछ साल बाद, उसके रिश्तेदार छोटी लड़की की शादी करने की बात करने लगे. रोशनी कहती है, “लेकिन मैं शाम को अन्य बच्चों के साथ पढ़ना और खेलना चाहती थी. शादी का विचार इतना डरावना था कि मत पूछो.”  
एक दिन, जब दबाव बहुत अधिक पडा तो रोशनी अपने बच्चों के समूह (बाल समूह) के पास भाग गई और मदद की मांग की. रोशनी याद करती है, “मेरी सहपाठियों, शिक्षकों और अन्य बुजुर्ग मेरी मदद के लिए आगे आए. उन्होंने मेरी शादी रोकने के लिए मेरे दादा-दादी पर दबाव डाला. बहुत आग्रह के बाद, मेरे दादा-दादी सहमत हुए.”
उसके बाद के कुछ साल ठीक बीते. लेकिन जब रोशनी 16 साल की हो गई, तो उसकी शादी को ले कर फिर बात शुरू हुई. उसके रिश्तेदार फिर से शादी की बात करने लगे. रोशनी यादा करते हुए कहती है,” मेरे रिश्तेदार मुझ पर शादी करने के लिए दबाव डाल रहे थे. मैंने इनकार कर दिया तो मुझ पर शारीरिक हमला किया. हर बार जब मैं मना करती थी तो मुझे प्रताड़ित किया जाता था." ये बोलते हुए रोशनी की आँखों में दर्द उभर आता है. रोशनी ने आवाज तो उठाई मगर उसके पड़ोस के लोगों ने उसकी हिम्मत की कदर नहीं की. लोग तिरस्कार से उसकी ओर देखते थे. लोगों ने अपने बच्चों को उसके साथ मिलने-जुलने से मना कर दिया. लोग उसे विलेन मानने लगे थे.
रोशनी को आखिरकार उसके गाँव से बाहर निकाल दिया गया. लेकिन वह फिर भी दृढ़ रही और खुद को शिक्षित करने के अपने मिशन पर कायम रही. बहुत सारे वित्तीय और व्यक्तिगत संघर्ष के बाद, रोशनी ने आर्ट्स में स्नातक कर लिया.
शिक्षा ने रोशनी को अपनी शर्तों पर जीवन जीने का आत्मविश्वास दिया. वह कहती है, "मुझे एहसास हुआ कि मेरी तरह, कई अन्य लड़कियां भी हो सकती हैं जिन्हें अपनी इच्छा के खिलाफ शादी करने के लिए मजबूर किया जा सकता है. कुछ ऐसी भी होंगी जो जल्दी शादी के कारण पढ़ नहीं सकी. मैंने दूसरी लड़कियों के लिए काम करने का फैसला किया.”
रोशनी ने उन घरों में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू कर दी, जहां युवा लड़कियों को शादी के लिए मजबूर किया जा रहा था. वह माता-पिता, दादा-दादी और यहां तक कि पड़ोसियों को भी काउंसलिंग के जरिए जल्दी शादी और मातृत्व की बीमारियों और नुकसान के बारे में बताने लगी.
आज, लोग उसके गाँव को रोशनी के गाँव के रूप में पहचानते हैं, लेकिन बाल विवाह को पूरी तरह से समाप्त करना एक बहुत बड़ा काम है. रोशनी बताती है, "गाँव से बाहर निकाल दिए जाने के बाद भी मैं गाँव के बच्चों के संपर्क में रही. मेरे पास खोने के लिए अब कुछ भी नहीं है, क्योंकि मुझे अपने ही गाँव से बेदखल किया जा चुका है. मुझे सिर्फ इस बात की परवाह है कि जो मैंने झेला वो किसी और को न झेलना पड़े."
रोशनी कहती हैं, "जो आवाज़ें मायने रखती हैं, उन्हें सशक्त बनाने के लिए, मैं अब नेशनल एनजीओ पॉपुलेशन फ़ाउंडेशन ऑफ़ इंडिया द्वारा चलाए जा रहे #ZeroTeenMothers अभियान में शामिल हो गई हूं, जिसका उद्देश्य राजस्थान में कम उम्र में गर्भधारण के नुकसान के बारे में अधिक से अधिक जागरूकता पैदा करना है. राजस्थान की आबादी का पाँचवां हिस्सा किशोर हैं. किशोरों के बेहतर स्वास्थ्य के लिए लड़ने की जरूरत है ताकि उनके और देश के लिए एक बेहतर कल बन सके.”


 #ZeroTeenMothers अभियान ने राजस्थान के नीति निर्धारकों का समर्थन प्राप्त किया है जो एक ठोस परिवर्तन में विश्वास करते हैं. यह अभियान 12 जनवरी, 2020 को राष्ट्रीय युवा दिवस के अवसर पर शुरू किया गया और इसे राज्य भर में समर्थन प्राप्त हुआ. अभियान से राजस्थान में किशोर गर्भावस्था के मुद्दे पर फिर से चर्चा करने और इसे समाप्त किए जाने की उम्मीद है.
पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ़ इंडिया भारत की एक अग्रणी नागरिक समाज संस्था है, जिसकी स्थापना 1970 में जेआरडी टाटा और डॉ भरत राम ने की थी. इसका मिशन महिला सशक्तीकरण के साथ ही महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य और अधिकारों को आगे बढ़ाना है ताकि महिला और पुरुष, विशेष रूप से किशोर और युवा, अपने स्वास्थ्य, भलाई और समृद्धि के लिए सूचित विकल्प लेने में सक्षम हो सके.

पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया ने किशोर स्वास्थ्य में सुधार के लिए चुनौतियों और सिफारिशों को पहचानने और आगे बढ़ाने के लिए देश भर में पहले से ही आठ यूथ लेड कंसल्टेशन आयोजित किए हैं. PFI उत्तर प्रदेश और बिहार में किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रमों के बारे में जागरूकता बढ़ाने और विशेष रूप से निशक्तजनों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार करने के लिए भी काम करता है.

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