जनजाति क्षेत्र के किसानों के हित में मुख्यमंत्री का निर्णय 

 

जयपुर। राज्य सरकार ने जनजाति क्षेत्र में आदिवासी किसानों को नियमित मंडी की सुविधा उपलब्ध करवाने तथा कृषि उपजों के लाभकारी मूल्य दिलाने के उद्देश्य से बांसवाड़ा कृषि उपज मंडी में कृषि जिन्सों का व्यापार शुरू करने के लिए दुकानों का आवंटन प्रचलित डीएलसी दर की 100 प्रतिशत के स्थान पर 50 प्रतिशत पर करने का निर्णय लिया है। मुख्यमंत्री  अशोक गहलोत ने इस संबंध में कृषि विपणन विभाग के प्रस्ताव को स्वीकृति दे दी है। निर्णय के अनुसार, 50 प्रतिशत डीएलसी दर पर आधारित आवंटन राशि तथा निर्माण लागत जमा करवाने के बाद मूल आवंटी मंडी परिसर में व्यापार शुरू कर सकेंगे। इन आवंटनों के लिए दुकान की निर्माण लागत की गणना वर्ष 1980-81 की वास्तविक निर्माण लागत को आधार मानकर की जाएगी। साथ ही, आवंटन राशि जमा नहीं करवाने के कारण मंडी समिति द्वारा निरस्त किए गए आवंटन भी बहाल किए जाएंगे। प्रस्ताव के अनुसार, इन शिथिलताओं के साथ-साथ कुछ दुकानों के ढ़ांचे अत्यधिक क्षतिग्रस्त होने के चलते आवंटी को पूर्णरूपेण नवीन निर्माण कराने की भी छूट होगी। इसके लिए आवंटी को मंडी समिति द्वारा तय टाइप डिजाइन के अनुसार दुकान का निर्माण 3 माह की अवधि में करना होगा और फिर मण्डी प्रांगण के बाहर संचालित व्यापार को बंद कर मंडी प्रांगण में स्थानातंरण करना होगा। जनजाति क्षेत्र बांसवाडा में नियमित मण्डी की सुविधा नहीं होने से आदिवासी किसानों को अपनी कृषि उपज को समीपस्थ राज्य गुजरात में विक्रय हेतु ले जाना पड़ता था। लम्बे समय से व्यापार स्थानान्तरण में आ रहे गतिरोध की समाप्ति के उपरान्त अब जिला मुख्यालय पर स्थित मण्डी में कृषि जिन्सों का व्यापार स्थानान्तरण हो पायेगा जिससे क्षेत्र के किसानों, व्यापारियों एवं आम जनता को लाभ प्राप्त हो सकेगा। राज्य सरकार के इस निर्णय से आवंटन राशि तथा निर्माण लागत में छूट से राजकोष को 2.17 करोड़ रूपये की हानि होगी, लेकिन मंडी निर्माण के लगभग 40 वर्ष पश्चात् मुख्य मण्डी परिसर बांसवाड़ा में कृषि जिन्सों का व्यापार जल्द शुरू हो सकेगा और मंडी की परिसम्पत्ति की उपयोगिता सुनिश्चित हो सकेगी। शिथिलताओं के बाद मंडी समिति तथा व्यापारियों के बीच व्यापार स्थानातंरण को लेकर गतिरोध समाप्त होगा और मंडी समिति तथा राज्य सरकार के राजस्व में वृद्धि होगी। साथ ही, कृषि जिन्सों के उचित मूल्य के रूप में जनजाति क्षेत्र के किसानों को इसका लाभ मिलेगा।

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