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आषाढ़ पूर्णिमा (गुरुपूर्णिमा) के दिन मनाई जाती है भगवान श्री दक्ष प्रजापति महाराज की जयंती

राजस्थान समाज सेवक रमेश कुमार प्रजापति ने बताया कि कोरोना वैश्विक महामारी के कारण कल आषाढ़ पूर्णिमा (गुरु पूर्णिमा) रविवार 5 जुलाई, 2020 को  भगवान श्री दक्ष प्रजापति महाराज जयंती है जो कि हमेशा इस दिन प्रजापति/कुम्हार समाज मे बड़े हर्ष उल्लास के साथ, शोभायात्रा, उसकी लीलाएं, व अन्य तरीके से मनाई जाती है परंतु इस वर्ष कोरोना वैश्विक महामारी संकट के कारण सामूहिक रूप से राजस्थान समाज सेवक रमेश कुमार प्रजापति के द्वारा सम्पूर्ण राजस्थान में नही मनाया जाएगा केवल साधारण तरीके से ही केवल प्रदेश, जिला व तहसील कार्यालय में ही मनाया जाएगा बाकी सभी समाज बन्धुओ से निवेदन किया है कि सोशल डिस्टेंस, मास्क, व सैनेट्रीज करके अपने अपने घर परिवार के साथ मनाया जाएगा।
 महाराज दक्ष प्रजापति की जयंती के उपलक्ष्य में भगवान श्री दक्ष प्रजापति महाराज की कहानी निम्न है  हम उनके वंशज, उनको नमन करते हैं.
आप भी उनके बारे में जानें
दक्ष प्रजापति को  ब्रह्मा जी ने अपने मानस पुत्र के रूप में रचा था। दक्ष प्रजापति का विवाह स्वयंभुव मनु की तृतीय कन्या प्रसूति के साथ हुआ था। बताया जाता है कि चारों वेदों रचना उन ही ने की थी. दक्ष प्रजापति की पत्नी स्वायम्भूव मनु पुत्री प्रसूति ने सोलह कन्याओं को जन्म दिया जिनमें से स्वाहा नामक एक कन्या का अग्नि देव का साथ, सुधा नामक एक कन्या का पितृगण के साथ सती नामक एक कन्या का भगवान शंकर के साथ और शेष तेरह कन्याओं का धर्म के साथ विवाह हुआ। धर्म की पत्नियों के नाम थे- श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, उन्नति, बुद्धि, मेधा, तितिक्षा, द्वी और मूर्ति।
दक्ष प्रजापति ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया था जिसमें द्वेषवश उन्होंने अपने जामाता भगवान शंकर और अपनी पुत्री सती को निमन्त्रित नहीं किया। शंकर जी के समझाने के बाद भी सती अपने पिता उस यज्ञ बिना बुलाये ही चली गईं। यज्ञस्थल में दक्ष प्रजापति ने सती और शंकर जी का घोर निरादर किया। अपमान न सह पाने के कारण सती ने तत्काल यज्ञस्थल में ही योगाग्नि से स्वयं को भस्म कर दिया। सती की मृत्यु का समाचार पाकर भगवान शंकर ने वीरभद्र द्वारा उस यज्ञ का विध्वंश करा दिया। वीरभद्रने दक्ष प्रजापति का सिर भी काट डाला। बाद में ब्रह्मा जी की प्रार्थना करने पर भगवान शंकर ने दक्ष प्रजापति को उसके सिर के बदले में बकरे का सिर प्रदान कर उसके यज्ञ को सम्पन्न करवाया।

 

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