यदि भारत ने विश्व पर इंग्लैंड की तरह साम्राज्य स्थापित किया होता! (भाग–3) – ठाकुर दलीप सिंघ जी

भारत ने किसी भी देश को गुलाम बना कर, इंग्लैंड की तरह अपना साम्राज्य स्थापित नहीं किया। भारत की धर्मपरायणता, नैतिकता, सहिष्णुता, दयालुता, संयम आदि के विपरीत; जिन अंग्रेज़ों ने हर प्रकार की अनैतिकता, कपट, क्रूरता आदि का उपयोग कर के विश्व पर साम्राज्य स्थापित किया: उन की भाषा ‘अंग्रेज़ी’ आज विश्व में तो फैल […]

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ST Correspondent Verified Media or Organization • 16 Apr, 2026 Team
June 24, 2025 • 3:35 PM  0
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यदि भारत ने विश्व पर इंग्लैंड की तरह साम्राज्य स्थापित किया होता! (भाग–3) – ठाकुर दलीप सिंघ जी
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24 Jun 2025
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यदि भारत ने विश्व पर इंग्लैंड की तरह साम्राज्य स्थापित किया होता! (भाग–3) – ठाकुर दलीप सिंघ जी
यदि भारत ने विश्व पर इंग्लैंड की तरह साम्राज्य स्थापित किया होता! (भाग–3) – ठाकुर दलीप सिंघ जी

भारत ने किसी भी देश को गुलाम बना कर, इंग्लैंड की तरह अपना साम्राज्य स्थापित नहीं किया। भारत की धर्मपरायणता, नैतिकता, सहिष्णुता, दयालुता, संयम आदि के विपरीत; जिन अंग्रेज़ों ने हर प्रकार की अनैतिकता, कपट, क्रूरता आदि का उपयोग कर के विश्व पर साम्राज्य स्थापित किया: उन की भाषा ‘अंग्रेज़ी’ आज विश्व में तो फैल ही गई है। अपितु, भारत में भी लोग अपनी मातृ-भाषा छोड़ कर, विदेशी अत्याचारी अंग्रेज़ों की भाषा ही अपनाने लगे हैं। भारतीय भाषाएं (जो कि पूरे विश्व में सर्वोत्तम हैं); अपनी मातृभूमि भारत में ही आज लुप्त होती जा रही हैं।

भारतीयों की धार्मिक आधारहीन सहनशीलता तथा नैतिकता का कड़वा फल, भारतवासियों को तथा भारत को प्रत्यक्ष रूप से यह मिल रहा है कि आज भारत सरकार के सभी विशेष कार्य; किसी भी भारतीय भाषा में नहीं होते, अपितु विदेशी भाषाअंग्रेज़ीमें होते हैं। भारतीय न्यायालयों में सभी लिखतपढ़त भी अंग्रेज़ी भाषा में ही होती है। यहाँ तक कि जिस को अंग्रेज़ी आती हो, भारतीय भाषा का बड़ा विद्वान होते हुए भी उसको अनपढ़ माना जाता है। हालात इतनी बुरी है कि अपने देश कोभारतकहने में भी हमें शर्म आती है। परंतु, ‘इंडियाकहने से गर्व अनुभव होता है। यदि भारत ने विश्व पर इंग्लैंड की तरह अपना साम्राज्य स्थापित किया होता, तो भारत कभी भी ‘हिंदुस्तान’ या ‘इंडिया’ न बनता, सदैव ‘भारत’ ही रहता।

आज भारतीय भाषाओं में तथा जनता की बोलचाल में उर्दू, फारसी, अरबी, इंग्लिश आदि विदेशी भाषाओं के शब्दों का, अवचेतन मन से ही अधिक उपयोग हो रहा है। यदि भारत ने विश्व पर अपना साम्राज्य स्थापित किया होता, तो आज इंग्लैंड सहित पूरे विश्व की विदेशी भाषाओं में भारतीय भाषा के शब्द तो उपयोग होने ही थे; सम्पूर्ण विश्व की जनता भी अपनी बोलचाल में भारतीय शब्दों का उपयोग कर के गर्व महसूस करती, जिस तरह जनता आज अंग्रेज़ी के शब्दों का उपयोग कर के गर्व महसूस करती है।

यदि भारत ने विश्व पर इंग्लैंड की तरह अपना साम्राज्य स्थापित किया होता, तो हम भारतीय भी विदेशी भाषाओं के शब्दों से अपने नाम कभी भी ना रखते, जैसे गुलाम रहने के कारण, आज हम भारतीय लोग, विदेशी भाषाओं में अपने नाम रख कर, उन नामों पर गर्व करते हैं, उदाहरण स्वरूप: करनैल सिंघ, जरनैल सिंघ, हनी, लक्की, लवली, जैसमीन आदि अंग्रेज़ी के और हाकम सिंघ, साहिब सिंघ, इबादत कौर, आदि फारसी के नाम हैं। स्थिति इतनी गंभीर है कि भारतीय लोग अपने नाम का सही उच्चारण छोड़ कर, विदेशियों की सहूलत के अनुरूप अपने ही नाम का गलत उच्चारण आरंभ कर देते हैं। जैसे सिंघ को सैम, ढिल्लों को ढिलन, हरभेज को हैरी, गुरभेज को गैरी आदि।

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