समग्र स्वास्थ्य और स्वास्थ्य देखभाल के लिए एक प्राचीन जड़ी-बूटी 'शतावरी'

सुनील कायस्थ, कमल कुमार गुप्ता और रोशनी राजमोहन द्वारा, देशबंधु महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालयनई दिल्ली, 23 जून : ऐसे समय में जब पारंपरिक...

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ST Correspondent Verified Media or Organization • 16 Apr, 2026 Team
June 23, 2026 • 9:53 PM | New Delhi  0
Last Edited By: Mamta Choudhary (3 hours ago)
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समग्र स्वास्थ्य और स्वास्थ्य देखभाल के लिए एक प्राचीन जड़ी-बूटी 'शतावरी'
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23 Jun 2026
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समग्र स्वास्थ्य और स्वास्थ्य देखभाल के लिए एक प्राचीन जड़ी-बूटी 'शतावरी'
सुनील कायस्थ, कमल कुमार गुप्ता और रोशनी राजमोहन द्वारा, देशबंधु महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय

नई दिल्ली, 23 जून : ऐसे समय में जब पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान स्वास्थ्य देखभाल को नया रूप दे रहे हैं, शतावरी एक प्राचीन जड़ी-बूटी वैश्विक हर्बल चिकित्सा में एक आधारशिला के रूप में उभर रही है। भारत में सदियों से पूजनीय यह औषधीय पौधा अपने बहुआयामी चिकित्सीय गुणों, आर्थिक मूल्य और समग्र स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों में भूमिका के कारण विश्व स्तर पर तेजी से मान्यता प्राप्त कर रहा है।

शतावरी उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय जलवायु में अच्छी तरह पनपती है। यह भारत, श्रीलंका, नेपाल और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों में व्यापक रूप से पाई जाती है। भारत में, इसके खेती के प्रमुख क्षेत्र मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु हैं। यह पौधा शुष्क सहिष्णुता और विभिन्न पारिस्थितिक स्थितियों के प्रति अनुकूलन प्रदर्शित करता है। शतावरी, एस्पैरोगेशी कुल से संबंधित एक लता है, जिसकी विशेषता इसकी पतली, सुई जैसी शाखाएँ, छोटे सफेद सुगंधित फूल और कंदयुक्त जड़ें हैं। शतावरी की जड़ें रसीली, सफेद और गुच्छों में होती हैं और औषधीय गुणों से भरपूर होती हैं।

भारतीय ज्ञान प्रणाली में निहित वैदिक साहित्य और आयुर्वेद में शतावरी को एक विशेष स्थान दिया गया है। चरक संहिता और सुश्रुत संहिता जैसे आयुर्वेदिक ग्रंथों में, शतावरी को रसायन के रूप में वर्गीकृत किया गया है। यह एक दीर्घायु, रोग-प्रतिरोधक, स्फूर्तिदायक और कायाकल्प करने वाली जड़ी-बूटी है। इसका स्वाद मधुर (मीठा), तासीर शीत वीर्य (शीत) और पित्त तथा वात दोषों में लाभकारी है। शतावरी का उपयोग यूनानी और तिब्बती चिकित्सा सहित एशिया की पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों में किया जाता है। पारंपरिक औषधीय अभिलेखों से पता चलता है कि इसका उपयोग पाचन संबंधी विकारों, तंत्रिका संबंधी समस्याओं और प्रजनन संबंधी बीमारियों के उपचार में किया जाता रहा है।

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