क्या है भारत का स्वधर्म

विधर्म न सिर्फ धर्म के अनुरूप नहीं है, बल्कि धर्म विरुद्ध चलते हुए धर्म का खंडन करने का काम करता है।

Radhika Joshi
Radhika Joshi Verified Local Voice • 01 May, 2026 Author
September 24, 2022 • 3:17 PM  0
लाइफस्टाइल
NEWS CARD
Logo
क्या है भारत का स्वधर्म
“क्या है भारत का स्वधर्म”
Favicon
Read more on sangritimes.com
24 Sep 2022
https://www.sangritimes.com/what-is-swadharma-of-india
Copied
क्या है भारत का स्वधर्म
क्या है भारत का स्वधर्म

‘‘भारत के स्वधर्म पर हो रहे विधर्म के घातक हमले को रोकने की एक कोशिश है भारत जोड़ो यात्रा।’’  मेरा यह संक्षिप्त सा जवाब था यात्रा के दौरान बार-बार इसके औचित्य को लेकर पूछे जा रहे इन सवालों का। जाहिर है इस सूत्र वाक्य से अधिकांश लोगों की जिज्ञासा शांत नहीं होती। उत्तर से अधिक प्रश्न खड़े होते हैं। 

भारत का स्वधर्म क्या है? एक व्यक्ति या जाति का स्वधर्म तो सुना है। किसी देश का भी कोई स्वधर्म हो सकता है? कुछ लोगों को स्वधर्म जैसा शब्द सुनकर आशंका होती है कि यह किसी राष्ट्रीय धर्म जैसी कुछ बात है। कुछ देशों में इस्लाम या ईसाई धर्म को आधिकारिक मान्यता है। उसकी तर्ज पर कुछ लोग भारत में हिन्दू राष्ट्र का विचार चलाते रहते हैं। भारत के स्वधर्म का विचार कहीं इस दिशा में तो इशारा नहीं कर रहा? यूं भी भारत के स्वधर्म की खोज कहां करें? इसकी व्याख्या कौन करेगा? शुरूआत भगवद्गीता से करते हैं। इसलिए नहीं कि धर्म की अवधारणा की शुरूआत यहां से होती है,  बल्कि इसलिए कि वैदिक सभ्यता के धर्म और उसे मिली बौद्ध धर्म की चुनौती का सामंजस्य करते हुए भगवद्गीता हमारी सभ्यता के कुछ बुनियादी मूल्यों का सूत्रपात करती है। 

गीता का प्रसिद्ध श्लोक है : ‘श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह:।।’ (भगवद्गीता 3.35) यानी कि अच्छी प्रकार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से, गुणरहित भी, अपना धर्म अति उत्तम है। अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारक है और दूसरे का धर्म भय को देने वाला है। जाहिर है यहां धर्म का अर्थ मजहब या रिलिजन नहीं है। यह  हिन्दू, इस्लाम या ईसाई वाला धर्म नहीं है, उन्हें पंथ ही कहना चाहिए। यहां धर्म वह है जो धारण करने योग्य है, जो नैतिक है। 

bolt यह भी जरूर पढ़ें

साथ ही यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि धर्म की यह व्याख्या ब्राह्मणवादी हो यह जरूरी नहीं है। बेशक भगवद्गीता में स्वधर्म का प्रयोग चतुर्वर्ण की जातिवादी रूढि़ को पुष्ट करता दिखाई दे सकता है। लेकिन  शुरूआत से ही धर्म की अवधारणा की ब्राह्मणवादी और सधुक्कडी व्याख्या की दो धाराएं एक साथ चली हैं। ब्राह्मणवादी धारा ने धर्म को किसी एक जाति, समुदाय या परिस्थिति से जोड़ा, लेकिन सधुक्कड़ी परंपरा ने धर्म को एक सामान्य नैतिक मानदंड  के रूप में स्थापित किया। अशोक के शिलालेख का धम्म इसी परंपरा से निकला है। भारत के स्वधर्म की व्याख्या को हमारी सभ्यता की इस उद्दात्त धारा से जोडऩा होगा। 

Radhika Joshi Verified Local Voice • 01 May, 2026 Author

Journalist & Writer

home Home amp_stories Web Stories local_fire_department Trending play_circle Videos mark_email_unread Newsletter